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बिहार आंगनबाड़ी सिस्टम में बड़ा खुलासा

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बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों में फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू होने के बाद बच्चों के पंजीकरण में करीब 25 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। डिजिटल वेरिफिकेशन से पुराने रिकॉर्ड और अनियमितताओं का बड़ा खुलासा हुआ है।

पटना/आलम की खबर:बिहार में आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़ा एक बड़ा प्रशासनिक खुलासा सामने आया है, जिसने पूरे बाल विकास और पोषण व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य में फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू होने के बाद 3 से 6 वर्ष की उम्र के बच्चों के पंजीकरण में करीब 25 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट अचानक नहीं आई बल्कि डिजिटल वेरिफिकेशन और आधार आधारित सत्यापन व्यवस्था की सख्ती के बाद लगातार सामने आती गई, जिससे पहले के रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच का बड़ा अंतर उजागर हो गया है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023 में आंगनबाड़ी केंद्रों में लगभग 51 लाख 72 हजार बच्चे दर्ज थे, जो वर्ष 2024 में बढ़कर 55 लाख 60 हजार से अधिक हो गए थे। लेकिन जैसे ही फेस कैप्चरिंग सिस्टम और पोषण ट्रैकर ऐप आधारित सत्यापन पूरी तरह लागू हुआ, तस्वीर बदलने लगी। मार्च 2026 तक यह संख्या घटकर लगभग 40 लाख 35 हजार पर पहुंच गई, जिसने पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और रिकॉर्डिंग व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

फेस कैप्चरिंग सिस्टम क्या है

राज्य सरकार ने आंगनबाड़ी सेवाओं को पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के लिए फेस कैप्चरिंग सिस्टम लागू किया था। इसके तहत हर लाभार्थी बच्चे की फोटो पोषण ट्रैकर ऐप पर अपलोड करना अनिवार्य किया गया और उसे आधार नंबर से लिंक किया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सरकारी पोषण योजना का लाभ केवल वास्तविक और उपस्थित बच्चों तक ही पहुंचे।

कैसे सामने आया बड़ा अंतर

डिजिटल वेरिफिकेशन शुरू होने के बाद जब हर बच्चे की फोटो और पहचान का मिलान किया गया, तो कई रिकॉर्ड मेल नहीं खा सके। पहले कागजों में दर्ज आंकड़े वास्तविक उपस्थिति से काफी अलग पाए गए। कई केंद्रों पर पहले बच्चों की संख्या अधिक दिखाकर अतिरिक्त लाभ और सामग्री का आवंटन लिया जाने की बात भी सामने आई। जैसे ही फेस कैप्चरिंग सिस्टम सख्त हुआ, फर्जी और डुप्लीकेट एंट्री धीरे-धीरे सिस्टम से बाहर होने लगी।

डिजिटल निगरानी से बदली व्यवस्था

नई व्यवस्था में पोषण ट्रैकर ऐप एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आंगनबाड़ी सेविकाओं को हर दिन बच्चों की उपस्थिति के साथ उनकी फोटो अपलोड करनी होती है। यह फोटो सीधे केंद्रीय डेटाबेस से मिलाई जाती है और केवल मिलान होने पर ही लाभ स्वीकृत किया जाता है। इससे पूरा सिस्टम अब मैनुअल से डिजिटल और वेरिफिकेशन आधारित हो गया है।

प्रशासनिक हलचल

आंकड़ों में आई इस बड़ी गिरावट के बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच और समीक्षा तेज कर दी गई है। कई जिलों में यह देखा जा रहा है कि पहले किस स्तर पर रिकॉर्ड में अंतर था और किस प्रकार अनियमितताएं दर्ज की गई थीं। अधिकारियों का कहना है कि यह गिरावट वास्तविक स्थिति का सामने आना है, न कि किसी योजना की विफलता।

सामाजिक और नीतिगत बहस

इस बदलाव ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक ओर इसे पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या पहले वर्षों तक योजनाओं का लाभ सही तरीके से वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच रहा था या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव लंबे समय से चली आ रही रिकॉर्डिंग और निगरानी की कमजोरियों को उजागर करता है।

सरकार का रुख

आईसीडीएस विभाग का कहना है कि फेस कैप्चरिंग सिस्टम का उद्देश्य किसी को दोषी ठहराना नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाना है। विभाग के अनुसार आने वाले समय में डेटा और अधिक सटीक होगा और हर जिले में वास्तविक लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित की जाएगी।

निष्कर्ष

बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों में सामने आया यह बदलाव केवल आंकड़ों की गिरावट नहीं बल्कि एक बड़े सिस्टम सुधार की शुरुआत है। फेस कैप्चरिंग और डिजिटल वेरिफिकेशन ने पुरानी अनियमितताओं को उजागर किया है और भविष्य के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था की नींव रखी है।

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